जब बड़े औद्योगिक घरानों का हज़ारों करोड़ रुपए का क़र्ज माफ हो सकता हैं तो तमिल किसानों के क्यों नही?

Posted on 12 Apr 2017 by Admin     
जब बड़े औद्योगिक घरानों का हज़ारों करोड़ रुपए का क़र्ज माफ हो सकता हैं तो तमिल किसानों के क्यों नही?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी 4 मार्च 2017 जौनपुर की एक चुनावी सभा में कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनते ही किसानों का कर्ज़ माफ कर देंगे। सरकार आई और उत्तर प्रदेश में किसानों की कर्ज माफी की ख़बर भी आई। थोड़ी ही सही पर यूपी के किसानों के लिए राहत के लिए कुछ तो प्रयास हुए ये अच्छी बात है। पर बड़ा सवाल ये है कि क्या कर्ज माफ़ी की घोषणा पर अमल सिर्फ उन्हीं राज्यों में होगा जहाँ भाजपा की सरकार बनेगी? क्या देश के दूसरे गैर भाजपा शासित राज्यों में किसानों की बदतर स्थित में सुधार और कर्ज़माफी की के लिए उम्मीद करना छोड़ दिया जाए?

परसों देश की संसद की चौख़ट पर जो कुछ भी हुआ वो बिल्कुल भी अप्रत्याशित था। भयानक सूखे की मार झेल रहे तमिलनाडू के किसान कर्ज़माफी को लेकर पिछले महीनेभर से दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। और इस दौरान इन किसानों ने विरोध को जो तरीके अपनाएं वो डिजिटल इंडिया का दंभ भरने वालों के गाल पर करारा तमाचा था। एक ओर जहाँ हमारे राजनेता आधुनिक किस्म के भारत (डिजिटल इंडिया कैशलेस इंडिया मेक इन इंडिया) की बातें करतें नहीं थकते तो वहीं दूसरी तरफ देश के एक राज्य के किसान देश की राजधानी में नरमुंड की माला पहने, दातों में चूहे और साँप दबाए, बदन पर पत्ते लपेटे, अर्धनग्न प्रदर्शन करने मजबूर हैं। उनके प्रदर्शन के इन तरीकों को देखकर तो एक बार इंसान की रूह तक काँप जाए। और जब इतना सब करने के बावजूद भी इन किसानों की किसी ने नहीं सुनी। तो इन्होंने वो कर दिया जो पिछले 70 सालों में इस देश में शायद ही कभी हुआ हो। जिसे देखकर लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला आम आदमी सिंहर उठे।

सोमवार को जब देश के प्रधानमंत्री आस्ट्रेलियाई प्रधानमन्त्री के साथ दिल्ली मेट्रों के वातानुकूलित कोच में सैल्फी ले रहे थे ठीक उसी समय तमिलनाडू के सूखा पीड़ित किसान कर्ज़माफी की माँग को लेकर तपती दोपहरी में संसद भवन की दहलीज़ पर नग्न होकर सड़क पर लेटे हुए थे। विरोध-प्रदर्शन का इतना भयावह रूप शायद देश ने पहली बार देखा था जब अपनी माँगे पूरी करवाने को लेकर देश का अन्नदाता इस तरह के प्रदर्शन करने पर मजबूर हुआ हो। लेकिन अफ़सोस जिम्मेदारों की नींद फिर भी नहीं टूटी। देश के कृषि मंत्री और प्रधानमंत्री दोनों इन सब से अनजान होकर अपने अपने कार्यक्रमों में व्यस्त थे। एक तरफ़ जहाँ देश के प्रधानमंत्री आस्ट्रेलियाई पीएम को देश के गौरव संस्कृति से रूबरू करा रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ़ कृषि प्रधान देश का किसान जिसे देश की जनता ने अन्नदाता का दर्जा दिया है वो लोकतंत्र के मंदिर के बाहर अपनी बेबसी और लाचारी का रोना रो रहा था और देश का ज्यादातर मीडिया घराना इतनी बड़ी घटना को नजरअंदाज करने के लिए पूरी ताकत से खुद को इस प्रदर्शन से दूर रखने की जद्दोजहद में लगा हुआ था।

अजीब बेशर्मी है साहब एक तरफ़ देश के बड़े औद्योगिक घराने अपने एक लाख 14 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बिना किसी हंगामें और विरोध प्रदर्शन किए माफ़ करवा ले जाते हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ महज़ कुछ हज़ार करोड़ की कर्ज़माफी की मांग को लेकर भयंकर सूखे की मार झाल रहे किसान आत्महत्या कर चुके किसानों की खोपड़ी और हाथ में कटोरा लिए नंगे बदन 2100 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए इस उम्मीद से दिल्ली आते हैं कि देश का प्रधान सेवक जो खुद को किसान हितैशी होने का दावा करता है वो इन किसानों की माँगों पर विचार करेगा उसे पूरा करने की कोशिश करेगा और ससम्मान उनके चेहरे की मुस्कान उन्हें लौटा देगा पर उन्हें क्या पता था कि इतना सबकुछ करने के बावजूद भी उनको सिर्फ हताशा और निराशा के अलावा कुछ भी नहीं मिलेगा।

आदरणीय प्रधानमंत्री जी उन बेबस किसानों की माँगे इतनी बड़ी भी नहीं है कि उनको मानना आपके बस की बात ना हो। देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मेरा निवेदन है आपसे कि कम से कम अन्नदाता की ऐसी स्थित पर तो दया कीजिए। उसने कर्ज इस उम्मीद से लिया था कि अच्छी फसल होगी और वो बैंक का कर्ज चूकाकर घर परिवार की खुशियों का बंदोबस्त कर सकेगा पर सूखे ने उसकी फसले चौपट करके उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया, उसकी हिम्मत जवाब दे गई और ऊपर से वो कर्ज के बोझ तले ब गया अब अगर बिना किसी कारण के औद्योगिक घरानों के कर्ज माफ किए जा सकते हैं तब इन बेबस किसानों का तो हक़ बनता है कि उनका कर्ज माफ कर दिया जाए।

Islahuddin Ansari



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