मुस्लिम मुद्दों पर मुस्लिम समाज ओवैसी से सवाल ना करे तो किस से करे।

Posted on 10 Jan 2017 by Admin     
मुस्लिम मुद्दों पर मुस्लिम समाज ओवैसी से सवाल ना करे तो किस से करे।

By Khalid Hussain

हर धर्म के लोग यही चाहते हैं की उसकी कयादत (नेतृत्व) उसी के धर्म का कोई व्यक्ति करे। मुसलमानों का भी हक़ बनता है की मुसलमानों का नेतृत्व भी मुस्लिम क़ौम के किसी व्यक्ति के ही पास हो। उत्तर प्रदेश की बात करें तो डॉक्टर ऐयूब, मौलाना आमिर रशादी इत्यादि दशकों से मुस्लिम समाज से जुड़े मुद्दे बहुत ज़ोर शोर से उठाते रहे हैं लेकिन यह और बात है की भारतीय मीडिया ने उनके कामों की अनदेखी की और उनको राष्ट्रीय स्तर पर वो कव्रिज नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे। मीडिया ने हमेशा ही उत्तर प्रदेश के मुस्लिम रहनुमाओं के साथ सौतेला व्यवहार किया। 

वर्ष 2014 के लोक सभा चुनावों के समय असदुद्दीन ओवैसी को राष्ट्रीय स्तर पर लोगों ने जाना। ओवैसी साहब जो की पहले कोंग्रेस के सहयोगी थे, वह अब एक मुस्लिम नेता की हैसियत से सम्पूर्ण भारत के सामने प्रस्तुत किए गए। मुस्लिम समाज शुरू से ही ना इंसाफ़ियों का शिकार रहा है। तो देश के मुसलमानों ने भी ओवैसी साहब को मुस्लिम नेता के तौर पर स्वीकार कर लिया, जिसका सबूत महाराष्ट्र के मुसलमानों ने भी दिया और AIMIM को मुसलमानों का ठीक ठाक वोट मिला। 
 
उसके कुछ समय बाद पता चला की उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी ओवैसी अपने प्रत्याशी उतारेंगे। तो उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में भी ओवैसी एक मुस्लिम रहनुमा की तरह देखे जाने लगे। अब यदि मुसलमान ओवैसी को अपना रहनुमा मान ही चुके हैं तो मुसलमानों से जुड़े मुद्दों पर सवाल भी मुसलमान अपने रहनुमा से ही पूछेंगे।  
 
मेरे कुछ मित्र सवाल करते हैं की, ख़ालिद भाई के अनुसार यदि नजीब के मुद्दे पर केजरीवाल को घेरना उचित नहीं क्यूँकि दिल्ली पुलिस केजरीवाल के अधीन नहीं आती जबकि दिल्ली में केजरीवाल की सरकार है।"
चलिये मान लिया अधीन नहीं आती ज़रा बताइये ख़ालिद भाई आप मेवात और बिजनौर पर ओवैसी को घेरते हैं तो क्या वहां की पुलिस ओवैसी के अधीन आती है?"
 
मेवात में जब घटना घटित हुई तो AAP के नवीन जयहिंद वहाँ पर खड़े नज़र आए। नजीब ग़ायब हुआ तो नजीब की माँ के लिए अरविंद केजरीवाल आगे आए। 
 
लेकिन मुस्लिम कयादत की बात करने वालों ने महीनों तक नजीब की माँ का हाल तक ना पूछा। जब यह मामला कुछ ज़्यादा ही तूल पकड़ गया तब थोड़ी देर के लिए आए और फिर उस के बाद क्या हुआ वो सबको पता है। अगर ओवैसी साहब की छवि एक मुस्लिम नेता की है तो सवाल भी उन से ही किया जाएगा ना की किसी बाबर पठान, बाबर जी० खान, साजिद अली या मुहम्मद तनवीर से। 
 
बात यदि ओवैसी को घेरने की है तो, लोकतंत्र में आलोचना होनी चाहिए। इन आलोचनाओं का ही नतीजा था कि ओवैसी साहब को नजीब की माँ के पास जाने को मजबूर कर दिया। किसी भी लोकतांत्रिक देश या समाज के लिए आलोचना आवश्यक है। यदि आलोचना नहीं होगी, तो समाज विकास नहीं कर सकता है। आलोचना और असहमतियों को सम्मान आवश्यक है। अगर आप चाहते हैं की आलोचना करने वालों की जीभ काट लें तो फिर इसके लिए आप को बहुमत में आना होगा ताकि आप ऐसा विधेयक ला सकें। 


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