उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, डॉक्टर ऐयूब साहब बनाम असदुद्दीन ओवैसी

Posted on 11 Jan 2017 by Admin     
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, डॉक्टर ऐयूब साहब बनाम असदुद्दीन ओवैसी

डॉक्टर ऐयूब साहब की पीस पार्टी का गठन वर्ष 2008 में हुआ था और पीस पार्टी ने लोकसभा चुनाव में भी हिस्सा लिया था जिसमें उनके एक भी प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पाए। लेकिन 2012 तक पीस पार्टी को लगभग 4 साल मिले और इन चार सालों में पीस पार्टी ने अपना संग़ठन मज़बूत कर लिया जिसका प्रतिफल यह मिला की पीस पार्टी ने 2012 का उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा और उनके 4 प्रत्यशि जीत गए।

यदि मुस्लिम कयादत (नेतृत्व) की बात की जाए तो उत्तरप्रदेश की सभी मुस्लिम पार्टियाँ जैसे राष्ट्रीय उल्मा काउन्सिल, पीस पार्टी, AIMIM, नवभारत निर्माण इत्यादि सब मिलकर और एक मज़बूत गठबंधन बना कर चुनाव लड़तीं तब मसुलिम कयादत मानी जाती। डॉक्टर ऐयूब ने ख़ुद ही आगे बढ़कर गठबंधन बनाना चाहा लेकिन ओवैसी स्वयं तैयार नहीं हुए। मुस्लिम कयादत का दावा करने वाले जब ख़ुद ही एक नहीं हो पाए तो उत्तरप्रदेश के 22% मुस्लिम मतदाताओं को कैसे एक करेंगे..??? यदि मुसलमानों का नेतृत्व करने वाले ही स्वयं बिखरे हुए हैं तो किसे मुस्लिम कयादत माना जाय..????

प्रश्न यह उठता है की यदि असदुद्दीन ओवैसी साहब मुस्लिम नेतृत्व के पक्ष में हैं तो AIMIM ने उत्तरप्रदेश में क्षेत्रीय पार्टियों गठबंधन क्यों नहीं किया...??? पीस पार्टी और RUC के साथ मिलकर चुनाव क्यों नहीं लड़ा...??
क्या वजह थी कि लखनऊ की मीटिंग से पहले AIMIM के एक बड़े पदाधिकारी न क्यों कहा कि अय्यूब के साथ चुनाव नहीं लड़ेंगे...??? यह उनके साथ क्यों नहीं गए..???

आज उत्तरप्रदेश में पीस पार्टी निषाद महासभा और महान दल के साथ चुनाव लड़ तो रही है। आखिर ये सब छोटे छीट दल AIMIM के साथ क्यों नहीं गए...??? AIMIM की ओर से सब को जोड़ने की कोशिश क्यूँ नहीं की गयी ???

आज की स्थिति यह है की पीस पार्टी आज AIMIM से ज़्यादा मज़बूत है तो लोग पीस पार्टी को उसे वोट ना देकर आखिर AIMIM को वोट क्यों दें..???

हम या आप लाख किसी पार्टी या नेता का पक्ष लें लेकिन हम और आप अपनी पार्टी और अपने नेताओं की नज़र में एक वोटर से ज़्यादा कुछ हैसियत नहीं रखते हैं। हमारे नेताओं में से किसी को मुस्लिम कयादत की फ़िक्र नहीं है। उन्हें केवल मुस्लिम वोट से मतलब है। हमारे मुस्लिम नेताओं को यदि मुसलमान क़ौम की फ़िक्र होती तो पहले वो सब ख़ुद एक हो गए होते।

Mohammad Khalid Hussain



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