140 सालों के इतिहास में सबसे बड़ा सूखा झेल रहे TN के किसान, मुंह में जिंदा चूहे और सामने इंसानी खोपड़ियां रख सुना रहे दुखड़ा, पर सुनने वाला कोई नहीं

Posted on 09 Apr 2017 by Admin     
140 सालों के इतिहास में सबसे बड़ा सूखा झेल रहे TN के किसान, मुंह में जिंदा चूहे और सामने इंसानी खोपड़ियां रख सुना रहे दुखड़ा, पर सुनने वाला कोई नहीं

अप्रैल 2015 याद है? जब राजस्थान के एक किसान ने एक पोलिटिकल रैली में खुद को फँसी लगा ली थी?बिलकुल याद होगा। हमारे चहिते नेताओ के बीच एक बहुत बड़ा दोषारोपण का खेल जो शुरू हुआ था उसके तुरंत बाद। मालूम है क्या? जल्दी ही शायद हमे ऐसा ही एक आध हादसा और देखने को मिले, और इस बार इसके ज़िम्मेदार हम होंगे। कैसे? 3 हफ्ते हो चुके हैं तमिल नाडू के किसानो को जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन करते हुए। जंतर मंतर, वही जगह जहाँ से अन्ना हज़ारे जी का विरोध शुरू हुआ और जिसके समर्थन में हम सब खड़े हुए थे, क्रांति इतनी बड़ी थी के पिछली सरकार का तख्ता पलट तक हो गया। जगह वही है लेकिन हमारी प्रतिक्रिया अलग है। हमारे अन्नदाता के तरफ हम कितना अनदेखा व्यव्हार रख सकते हैं ये इस बार हम सब ने बेशर्मी के साथ साबित कर दिया है।

तमिल नाडू अपने इतिहास के पिछले 140 सालो का सबसे बुरा सूखा झेल रहा है। पिछले साल आये कुछ छोटे बड़े तूफानों के बाद भी तमिल नाडू का अधिकतर हिस्सा सूखा ही है। सारे के सारे 32 जिले एक बहुत बुरे सपने जैसी सच्चाई से गुज़र रहा है। कई गाँव भुताह हालात में है, ज़मीन बंज़र हो चुकी है, कई किसान खुदखुशी कर चुके हैं, और हम! हम अभी भी बहरे बने बेठे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो 106 किसानो को हम अब तक खो चुके हैं, असलियत में शायद ये संख्या और भी ज़्यादा हो क्योंकि काफी मृत्यु तो हमारे यंहा रिपोर्ट ही नहीं की जाती। और जिस तरह से हम, मीडिया, रूलिंग पार्टी और विरोधी दल इस मुद्दे की तरफ अनदेखी कर रहे हैं, यह संख्या शायद अभी और बड़े।
कमज़ोर मानसून के अलावा हमेशा से चला आ रहा कर्नाटक और तमिल नाडू के बीच का कावेरी विवाद और एक के बाद एक उस मुद्दे को हल करने की हमारी नाकमियाबी भी तमिल नाडू की अभी के हालात के ज़िम्मेदार हैं।

फरवरी में तमिल नाडू के मुख्य मंत्री ने किसानो के लिए 2247 करोड़ रुपए मंज़ूर किए थे। लेकिन थांजवुर और तिरुचिरापल्ली, जो के सबसे बुरी तरह इस सूखे को झेलने वाले जिलो में से हैं, के किसान चाहते हैं के केंद्र 40000 करोड़ का एक सूखा राहत पैकेज दे और उनकी फसल का बेहतर दाम उन्हें दे।

जब हमारा मीडिया उत्तर भारत के बहुचर्चित मुख्य मंत्री के सर और दाढ़ी के बालो के बारे में न्यूज़ चला रहे थे, तब यह किसान हमारा ध्यान अपनी तरफ खीचने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे थे। सूखे के कारण जान दे चुके किसानो के खोपड़ी से ले कर मरे हुए चूहों को मुह में दबाने से ले कर सड़क में लोट कर और अब अपने हाथ काटने जैसे तरीके अपना चुके हैं, सिर्फ इसलिए जिस से हमारे बेहरे कान उनकी खामोश हो रही आवाज़ सुन चुके। लेकिन हम? हम उन मुद्दों में उलझे हैं जो शायद उतने एहम नहीं।

इस विरोध के शुरू होने के बाद कुछ दबाव तो बना ही है, तभी केंद्र और राज्य ने अपने अपने डिजास्टर रिलीफ फण्ड से कुछ 1712 करोड़ रुपए देने की बात करी है, लिकिन यह उनकी मांगो से कई दूर है।

दुःख की बात यह है के कुछ विरोधी नेता जो इन किसानो से मिलने गए, वो भी इस मुद्दे को ठीक से उठा नहीं रहे। हमारे प्रधान मंत्री जो अपना दफ्तर भगवान और बाबुओ के भरोसे छोड़ कर 2 महीने उत्तर प्रदेश में रैलिया कर सकते हैं उनके पास इतना समय नहीं के 2 घंटे का समय निकाल कर इन किसानो से बात कर सके। सुना है कल मोदीजी का मुखोटा पहने एक व्यक्ति के पैर पकड़ते हुए इन किसानो ने प्रदर्शन किया.. मोदीजी खुद को प्रधान सेवक बोलते हैं, लेकिन उनके पास हमे अन्न देने वालो के लिए 2 घंटे का समय भी नहीं है। और बात यहाँ सिर्फ उनकी नहीं, हमारे हर नेता की है जो सिर्फ उन मुद्दों पर उछलते हैं जो उन्हें spotlight दे सके। यह यहाँ जनसेवा नहीं, सिर्फ स्वयम सेवा कर रहे हैं और हम यह समझना नहीं चाहते।

अब सवाल यह उठता है के सरकार इतना पैसा लाएगी कहाँ से? तो कुछ तो ये डिजास्टर रिलीफ फण्ड से मदद कर ही चुके हैं, बाकी हमारे देश में एक कटिंजेंसी फण्ड अलग रखा जाता है, जिसमे ऐसी आपदाओ से निपटने के लिए अलग से पैसा सरकार जमा करती रहती है, क्या अभी वो समय नहीं के उस फण्ड का इन किसानो के लिए इस्तेमाल किया जाये? या अभी हम और जाने खोने का इंतज़ार कर रहे हैं?
और बाकी का रहा सहा पैसा तो देश भर में बन रहे बिना मतलब के पुतलो का निर्माण रोक कर या पोस्टपोन कर कर भी दिया जा सकता है। वैसे भी इस देश को फ़िलहाल 3600 करोड़ के पुतलो से ज़्यादा राजस्थान में बनी इंद्रा गांधी नहर जैसी नहरो की ज़रूर है।

और हम, हम किस तरह इनकी मदद कर सकते हैं? अपना समर्थन दे कर।

आज, याने के सोमवार (10 अप्रैल 2017) को शाम 4 बजे से यह किसान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से विरोध यात्रा की शुरआत करेंगे। अगर कुछ नहीं तो आप वहां उनके साथ खड़े तो हो ही सकते हैं। जितने लोग दिखेंगे, उतना सरकारो को मुद्दे की एहमियत समझ आएगी, और यह तो आप भो समझते होंगे के जो दिन रात खुद भूखा रह कर हमारे लिए ज़मीन से अन्न ऊगा रहा है, वो भगवान से कम नहीं। अगर यह खुश नहीं रहेंगे, तो देश भी खुश नहीं रहेगा।
आपसे उम्मीद है के आप इस मसले की एहमियत को समझेंगे। सालो तक इन किसानो ने हमारे लिए बहुत कुछ किया है, और अब हमारा समय है उनके लिए कुछ करने का।

धन्यवाद।

By Stuti Jain



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