नाम और पहनावे पर ऐतराज़। घटिया सोच और संकुचित मानसिकता का उदाहरण।

Posted on 26 Dec 2016 by Admin     
नाम और पहनावे पर ऐतराज़। घटिया सोच और संकुचित मानसिकता का उदाहरण।

सोशल मीडिया पर फिजूल की बातों को लेकर बवाल होना कोई नई बात नही है। एक तरफ जहाँ आज के वक्त मे फेसबुक ट्विटर वाट्स्एप जैसी चीज़ें अपनी बात कहने का अपनी बातों को दुनियाँ तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम है तो वहीं दूसरी तरफ यहाँ भी छोटी मोटी बातो का बखेड़ा बनाकर बवाल खड़ा करने वाले लोगों की अच्छी खासी तादाद मौजूद है। यहाँ हर रोज़ किसी ना किसी चीज़ को लेकर दो विपरीत विचारधारा के लोगों के बीच बहस छिड़ी ही रहती है। अक्सर ये बहस सार्थक भी होती है और अक्सर निरर्थक भी। कुछ लोग अपनी नियमित दिनचर्या से फुरसत पाकर यहाँ अच्छी चीजों और अच्छी बातों की तलाश मे थोड़ा वक्त बितातें है तो कूछ लोग सोशल साइट्स से बचे वक्त को और यहाँ से हासिल फिजूल की बातों को लेकर उससे ही अपनी दिनचर्या की शुरुआत करते हैं।

फेसबुक पर मिले चंद लाईक/कमेंट/शेयर और ट्विटर के कूछ रिट्वीट/लाइक के चक्कर में ये तथाकथित बुद्धीजीवी लोग बिना सिर पैर के मुद्दों को लेकर फेसबुक/ट्विटर पर पूरे दमखम के साथ अपनी उपस्थित दर्ज कराते है। ये तथाकथित लोग अक्सर सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में कभी किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की फेसबुक वाॅल के कमेंटबॉक्स मे उछलकूद करते पाये जायेंगे या फिर अपनी फेसबुक वाॅल पर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति पर अनर्गल आरोप लगाकर खुद को बहोत बड़ा तीस मार खाँ साबित करने की तमाम जूगत भिड़ाते पाये जायेंगे। इनको इस बात से कोई सरोकार नहीं होता की कोई व्यक्ति देश और दुनियाँ के हिसाब से क्या अच्छा कर रहा है जिस वजह से उसे प्रसिद्धि प्राप्त हो रही है इन बेचारों की सारी पीड़ा यही रहती है की कोई इतना प्रसिद्ध क्यों होता जा रहा है। ये तथाकथित फेसबुकिया बुद्धिजीवी सारा दिन मोबाईल/कंप्यूटर स्क्रीन के सामने सिर्फ इसलिए आँख दुखाते बैठे रहते हैं की कब किसी बहाने इनको किसी पर फिजूल का कीचड़ उछालने का कोई बहाना मिल जाए।

अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर सोशल मीडिया पर जब सैफ और करीना के बेटे के नाम पर बवाल मचा तब सोशल मीडिया पर ऐसी घटिया मानसिकता के लोगो को जमकर लताड़ लगाई गई जो आज के प्रगतिशील समाज में भी किसी की निजी जिंदगी मे दखल देने की ओछी मानसिकता से ग्रसित है। माँ बाप का पूरा अधिकार है की वो अपने बच्चों के लिए क्या नाम पंसद करते है इसमें परिवार के लोगों के अलावा किसी और का दखल सरासर गलत है। हम और आप में से किसी का भी ये हक नहीं बनता की वो किसी आम/खास इंसान की इस तरह की निजी बातों को लेकर सोशल मीडिया जैसे ओपन स्पेस पर किसी भी तरह का हाय तौबा मचाये। क्योंकि ना तो ये किसी प्रकार का देशहित या जनहित का मुद्दा है और ना ही इससे किसी की सेहत में कोई फर्क पड़ने वाला है। अगर उसके बाद भी कोई इस तरह की निजी बातों को लेकर चर्चा में बने रहने का प्रयास कर रहा हो तो समझ लीजिए वो सिर्फ अपनी मानसिक स्थित से लोगो को अवगत कराने के अलावा और कुछ नहीं कर रहा है।

अब मानसिक दिवालियेपन का दूसरा उदाहरण देखिए देश के जाने माने क्रिकेट खिलाड़ी मोहम्मद शामी की अपनी पत्नी और बच्चे के साथ सोशल मीडिया पर शेयर की गई एक तस्वीर को लेकर सिर्फ इसलिए बवाल खड़ा हो गया क्योंकि उसमे शामी की पत्नि ने स्लीवलेस कुर्ती पहनी हुई थी। कोई क्या कर रहा है? क्या नही कर रहा है? ऐसा क्यों कर रहा है? वैसा क्यों नहीं कर रहा है? यहाँ तक तो देखा सबने अब इन तथाकथित बुद्धिजीवियों की एकदम नई तकलीफ सुनिये कोई क्या पहन रहा है इस बात को लेकर भी सोशल मीडिया पर टीका टिप्पणी होना शूरू हो गयी है। किसी ने बुर्का पहना तो बवाल किसी ने स्कर्ट पहनी तो बवाल। किसी को लड़कियों के जींस पहनने पर आपत्ति तो किसी को किसी के स्लीवलेस कपड़ों पर आपत्ति। कोई क्या पहनना पसंद करता है और क्या पहनना नहीं पसंद करता ये उसका अपना निजी फैसला है जिसके लिए बकायदा वो आज़ाद है। किसी की निजता पर इस तरह की दखलंदाजी आखिर हमारी सोच के किस स्तर को दर्शाता है। धर्म और समाज की आड़ लेकर हम कब तक किसी की निजी ज़िंदगी में ताकझांक जैसा घिनौना काम करेंगे। वो भी सोशल मीडिया जैसे ओपन प्लेटफॉर्म पर जहाँ पूरी दुनियाँ की नज़र हम पर होती है। हम क्या संदेश देना चाहते है दुनियाँ को।

दरअसल जिन्हें किसी के नाम से दिक्कत है और जिन्हें कपड़ों से दिक्कत है वो बिल्कुल भी अलग अलग नहीं है बल्कि एक ही मानसिकता के लोग है। इनके नाम अलग अलग जरूर हो सकते है पर इनका काम एक ही है बिलावजह की बहस और मुद्दों को जन्म देना। इनकी दिक्कत तैमूर नाम या स्लीवलेस कुर्ती से नहीं है इनकी असल दिक्कत इनकी संकुचित सोच है जो इन्हें किसी की निजी जिंदगी मे जबरन घुसकर उसमें दखल देने से नही रोक पाती। ये कलंक है उस धर्म और समाज पर जिसकी दी हुई मान मर्यादा और सम्मान की शिक्षा को दरकिनार कर ये हर रोज़ अपने धर्म और समाज का नाम नीचा करने पर तुले रहते है। लानत है ऐसी घटिता सोच वाले तथाकथित फेसबुक और ट्विटर के महारथियो पर।

धन्यावाद

आपका इस्लाहुद्दीन अंसारी



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