नजीब की माँ की फरियाद। कोई पूछता ही नहीं हाल मेरा, कोई लाकर दे दे मुझे लाल मेरा।

Posted on 01 Jan 2017 by Admin     
नजीब की माँ की फरियाद। कोई पूछता ही नहीं हाल मेरा, कोई लाकर दे दे मुझे लाल मेरा।

हर नया साल ढेर सारी नई चीज़े लेकर आता है नयी उम्मीदे और नई उमंगे लेकर आता है। ये नया साल भी कुछ ऐसी ही उम्मीदों और आशाओं का बोझ लिए आया है। एक माँ है जो पिछले ढाई महीनों से मुसलसल रो रही है। उसके आँखों से आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे। जब जब भी उस माँ की कोई तस्वीर नज़रों के सामने आती है तब तब दिल खुद से सैकड़ों सवाल पूछने लगता है। मन ये सोचकर विचलित हो उठता की अगर ये हाल हमारी माँ का हुआ होता तो हम पर क्या बीतती। ये हादसा हमारे परिवार पर गुजरा होता तो हम पर क्या बीत रही होती? नजीब की जगह हमारा कोई भाई पिछले ढाई तीन महीने से लापता होता तो हम पर क्या गुज़र रही होती? नजीब की माँ देश की राजधानी में पिछले 70 से भी ज्यादा दिनों से दर दर अपने बेटे की फरियाद लिए बदहवास सी भटक रही है। विरोध प्रदर्शनों मे अपने बेटे की तस्वीर सीने से लगाए आँखों मे अश्कों का समंदर समेटे पत्थरदिल हुक्मरानों से फरियाद कर रही है कि शायद कोई ऐसी सूरत नज़र आ जाऐ की उसका बेटा उसके आँचल की छाव में वापस आ जाए। मगर पत्थरदिल हुक्मरानों का दिल है की पिघलने तैयार ही नहीं है।

दिल्ली पुलिस जो की अपराध और अपराधियों के प्रति काफी संवेदनशील मानी जाती है। जिसने दिल्ली सरकार के मंत्रियों और विधायकों तक को नहीं बख्शा। वो दिल्ली पुलिस हाईकोर्ट की फटकार के बावजूद नजीब का अब तक कोई भी सुराग लगा पाने में पूरी तरह से नाकाम रही है। और ऐसी बात भी नहीं है कि दिल्ली पुलिस कोशिश नहीं कर रही है पर कोशिश कारगर क्यों नहीं हो पा रही है ये अहम सवाल है। ज़ाहिर सी बात है कि जब दिल्ली जैसे शहर से JNU जैसे कैंपस से कोई छात्र लापता हो जाए जिसे लेकर सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक प्रदर्शन हो रहा हो जिसकी गुमशुदगी पूरे देश में चर्चा का विषय हो जिसके लिए देश के छात्र लाठियाँ खा रहे हो और पूरी दिल्ली पुलिस मिलकर उसका सुराग ना लगा पा रही हो तो ऐसी सूरत में पुलिसिया कार्यप्रणाली पर सवाल उठना तो लाज़मी है।

दिल्ली एक ऐसा शहर है जहाँ की छोटी छोटी घटनाओं को भी ब्रेकिंग न्यूज में जगह मिलती है जहाँ की भेलपुरी और चाट की खबरें चैनल पर चटखारे मारकर सुनाई जाती है। जहाँ की हर अच्छी बुरी खबर चैनलों की सुर्खियाँ बन जाती है उसी शहर में जिसके इर्द-गिर्द लगभग तमाम न्यूज चैनलों और अखबारों के मुख्यालय है। उसी दिल्ली मे एक माँ JNU से गायब अपने बेटे के लिए चीखती रही, चिल्लाती रही, रोती रही फरियाद करती रही पर लगभग तमाम न्यूज चैनलों और अखबारों ने उस माँ की ममता को ब्रेकिंग न्यूज या अखबार के पन्नों पर जगह देना जरूरी नहीं समझा। याद रहे की ये वही मीडिया है जिसने JNU में कथित देशद्रोही नारे लगने की घटना पर आसमान सिर पर उठा लिया था और कई दिन लगातार JNU पर कवरेज करती रही यहाँ तक JNU में कंडोम वाले बयान तक को खबरो में जगह दी गई। वो मीडिया आखिर उसी JNU की इतनी गंभीर घटना पर मौन क्यों धारण किए हुए है ये बात समझ से परे है।

ये वही दिल्ली है जिसके इर्द-गिर्द देश के प्रधानमंत्री से लेकर सत्ता के वो तमाम चेहरे बसते हैं जो इस देश की सियासत के कर्ता-धर्ता है मगर कुछ ऐक नेताओं को छोड़कर (जिसमें सत्ताधारी पार्टी का एक भी नेता शामिल नहीं है) किसी ने भी ये ज़हमत नही उठाई की उस रोती बिलखती माँ से मिलकर उसे तसल्ली दे सके की सरकार उसके बेटे को लेकर पूरी तरह से संवेदनशील है उसे ढूंढने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। आखिर क्यों क्या वजह है कि ऐक माँ रोती बिलखती माँ की ममता पर बोलने के लिए आपके पास दो शब्द भी नहीं है उस माँ मिलने के लिए चंद लम्हों का वक्त नहीं है। आदरणीय प्रधानमंत्री महोदय अपने भाषणों में मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ दिलाने की बाते करते हैं पर उन्हीं के आवास से महज चंद किलोमीटर की दूरी पर एक मुस्लिम महिला इंसाफ की आस लगाए दर दर भटक रही हैं और आपने उससे बुलाकर बात करना तक जरूरी नहीं समझा ऐसे में हम कैसे यकीन कर ले की आप अपनी बात को लेकर गंभीर है हम कैसे मान ले की मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ दिलाने की आपकी बातों मे सच्चाई है।

इस्लाहुद्दीन अंसारी



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