सोनू निगम जी हमारे देश में अज़ान और आरती से सुकून महसूस करने वालों की तादाद अज़ान और आरती से खलल महसूस करने वालों से बहोत ज्यादा है।

Posted on 18 Apr 2017 by Admin     
सोनू निगम जी हमारे देश में अज़ान और आरती से सुकून महसूस करने वालों की तादाद अज़ान और आरती से खलल महसूस करने वालों से बहोत ज्यादा है।
जबलपुर में जिस जगह मै रहता हूँ वह मुस्लिम बहुल क्षेत्र कहलाता है। वहाँ आसपास एक बड़ा क्षेत्र मुस्लिम आबादी से घिरा हुआ है। वहीं बीचोंबीच शहर का एक चर्चित (चर्चित इसलिए कि वहाँ 24 घंटे चहल-पहल बनी रहती है) चौराहा है नाम है "चार-खंबा" और उसी चौराहे से 20 से 25 कदम की दूरी पर स्थित है शहर का प्रसिद्ध माँ बूढ़ी खेरमाई का मंदिर और उसी के इर्द-गिर्द तीन चार और मंदिर। नवरात्र के समय मंदिर में पूरे नौ दस दिन भारी तादाद में हिंदू भाई बहनों का आना जाना बना रहता है। नवरात्र के अलावा आम दिनों में भी वहाँ दर्शन के लिए रोज़ सैकड़ो लोग पहुँचते हैं। मंदिर से बिल्कुल लगी हुई एक मस्जिद भी है और उस मस्जिद के ठीक बाजू से एक दूसरी मस्जिद। साथ ही साथ मंदिर के चारो तरफ पूरी मुस्लिम आबादी। सुबह शाम मंदिर में आरती भी होती है और मस्जिद में पाँचों वक्त की नमाज़ भी। मंदिर में आरती के वक्त घंटा भी बजता है और मस्जिद में नमाज़ के पहले लाउडस्पीकर से अज़ान भी। दिन में कई बार मंदिर के श्रद्धालुओं का सामना मस्जिद के नमाज़ियों से हो जाया करता है। पर बचपन से लेकर आजतक मैने कभी भी ये नही सुना या देखा कि कभी मंदिर में आने वाले किसी श्रद्धालु को मस्जिद की अज़ान से किसी तरह का कष्ठ हुआ हो और ना ही किसी नमाज़ी या आसपास के किसी रहवासी से सुना कि उसे मंदिर में होने वाले किसी भी प्रकार के आयोजन से किसी प्रकार की कोई शिकायत हो।
 
देश के हर शहर में कोई ना कोई एक जगह ऐसी जरूर मिल जाएगी जहाँ हिंदू-मुस्लिम की मिली-जुली आबादी हो या फिर वहाँ मंदिर मस्जिद पास पास कुछ अपवादों को छोड़ कर दिया जाए तो कहीं किसी को किसी से किसी भी प्रकार की समस्या नहीं हैं। लोग मिलजुलकर एक दूसरे के तीज त्योहारों में सामाजिक एवँ धार्मिक आयोजनों में सहयोगात्मक रवैया अपनाते हुए देश की गंगा जमुनी तहज़ीब की विरासत को जिंदा रखे हुए हैं। छोटी मोटी बातों का दरकिनार करके आपसी मेलजोल की कोशिशे एक बेहतरीन समाज और एक जिम्मेदार नागरिक की सबसे अच्छी खूबी कहलाती है और आपसी भाईचारे को बनाए रखने के लिए ये जरूरी भी है।
 
सोनू निगम का ट्वीट सिर्फ ध्वनि प्रदूषण की चिंता को लेकर नहीं था। उन्होंने सीधे तौर पर एक धर्म विशेष को निशाना बनाया था। अगर उनकी चिंता ध्वनि प्रदूषण को लेकर होती तो वो सीधे सीधे लाउडस्पीकर को लेकर अपना गुस्सा ज़ाहिर करते ना कि मोहम्मद (स.अ.व.), मुस्लिम और इस्लाम का ज़िक्र करते हुए अज़ान पर निशाना साधते। सोनू पेशे से एक पाश्व गायक हैं। बैंड बाजा संगीत शहनाई शोरगुल उनकी जिंदगी का हिस्सा है। वो रात रात भर अपने शो के दरमियान ऐसे ही माहौल में रहते हैं जब पूरा का पूरा हाॅल शोरगुल से सराबोर रहता है। अब भला कैसे यकीन कर लिया जाए कि जो शख़्स इतने शोर शराबे का आदी हो उसे अपने वातानुकूलित कमरे में दूर किसी मस्जिद से आती हुई अज़ान की आवाज़ से किसी तरह की परेशानी होती होगी उसकी नींद में किसी तरह का खलल पैदा होता होगा।
 
सोनू का एक दर्द ये भी है कि जब मोहम्मद (स.अ.व.) के ज़माने मे लाउडस्पीकर नहीं थे तो फिर मुसलमान आज लाउडस्पीकर का इस्तेमाल क्यों करते हैं। सोनू का ये तर्क एकदम बच्चों वाला तर्क था। वो चाहते हैं कि वो खुद तो संसाधनों के आधुनिकतम साधनों का प्रयोग करे लेकिन एक मस्जिद से अज़ान के लिए 1400 साल पुराना तरीका ही इस्तेमाल किया जाए ताकि उनकी नींद में खलल ना पैदा हो। वो खुद तो शास्त्रीय संगीत से राॅक स्टार बन गए और चाहते हैं कि कोई दूसरा अपने पुराने तौर तरीकों पर ही गुजर बसर करता रहे। सोनू को लाउडस्पीकर पर अज़ान देना गुंडागर्दी नज़र आता है पर वो खुद नफ़रत फैलाने वाले ट्वीट करके खुद को शरीफ़ साबित करना चाहते हैं। मोहम्मद रफी के गानों और उस्ताद गुलाम मुस्तुफा खान से संगीत की शिक्षा हासिल करने वाला शख़्स मुस्लमानों की इबादतगाहो से निकलने वाली अज़ान की आवाज़ से खुद को इतना प्रताड़ित महसूस करेगा ये उम्मीद शायद किसी को नही थी।
 
हमारा देश आपसी भाईचारे और सभी धर्मों के लोगों के एक साथ मिल जुलकर रहने की खूबी की वजह से पूरी दूनियाँ मे अपनी एक अलग पहचान रखता है। नफ़रत के सौदागारो ने ना जाने कितनी कोशिशे कर डाली कि वो देश के इस भाईचारे को खत्म कर दे पर वो कभी अपने इन नापाक मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाए। जब जब भी देश के किसी भी हिस्से से हमें तोड़ने की आवाज़े उठी हुई तब तब देश के अमन पसंद लोगों ने उसका मूँह तोड़ जवाब दिया है। अंग्रेजी हुकूमत से लेकर आजतक हमें आपस में लड़ाने की कोशिशे जारी है पर हमारी मोहब्बतों के आगे ये कोशिशे हमेशा घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है। और इंशाअल्लाह आगे भी ये कभी अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पायेंगी। क्योंकि इस देश में अज़ान और आरती से नींद में खलल महसूस करने वालों की तादाद अज़ान और आरती सुनकर सुकून महसूस करने वालों की अपेक्षा ना के बराबर है।
 
By: Islahuddin Ansari


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