आखिर कबसे किसान विध्वंश का प्रतीक बन गया?

Posted on 09 Jun 2017 by Admin     
आखिर कबसे किसान विध्वंश का प्रतीक बन गया?
By: Vistasp Hodiwala
 
किसान अपनी ही उपज को महज़ किसी बचकानी महेच्छा को सिद्ध करने के लिए नष्ट नहीं करता है।
 
यहाँ पर उन पाखंडियों की आँखें खोलना बेहद ज़रूरी है जो गला फाड़-फाड़ के कह रहे हैं कि ये निश्चित ही कांग्रेस पार्टी द्वारा उकसाये जाने उपरान्त की गयी कार्यवाही है।
 
बता दें कि ये मुद्दा उस समुदाय से सम्बंधित है जिसे हम किसान या अन्नदाता कह कर पुकारते हैं, जो दिन रात खेतों में मिटटी-गारे से लबालब रहता है। जिसके जीवन में आदि से अंत तक खलिहानों के सिवा कुछ भी नहीं।
 
चंद ज़मींदारों को छोड़, इन बदनसीबों की हालत राज्य-राज्य में एक सामान सी है। साहूकारों से लेकर मौसम की मार, बीजों से लेकर खादों की क़ीमत की मार, साल दर साल इनके हालातों को बद से बदतर बनाये जा रही है।
 
और उससे भी बदतर है, राज्य की आर्थिक स्थिति जाने बिना चुनावों में किये गए इनसे हवाई क़रार।
 
जीवन की इन परिस्थितियों से निपटने के लिए और अपने परिवार के निर्वाह के साधन जुटाने के लिए अधिकतर किसानों के पास अब कोई रास्ता है ही नहीं। 
 
और अगर आपको ये कुछ कम लग रहा हो तो बात करते हैं हमारी सरकार के निति विशेषज्ञों की डेमोनेटिज़ेशन नीति का। जिसने इनके जीवन को बदतर बनाने वाली दीवार में एक नहीं...  कई ईंटें एक साथ जोड़ दी हैं।
 
जान लीजिये।
 
किसान उपज का प्रतीक है, विध्वंस का नहीं।
 
किसान के लिए अपनी ही उपज को ध्वस्त करना नीरा आक्रोश का प्रमाण है, 
 
जो अब अपने विवेक के आख़िरी छोर पर खड़ा है और इस छोर से धीरे-धीरे फिसल भी रहा है.  
 
क्यूंकि अब इसके पास न तो कोई विकल्प है, न कोई गुहार सुनाने वाला, और न ही इसकी बदतर दीवारों को तोड़ इसके जीवन का पुनः निर्माण करने वाला।
 
इससे पहले कि प्रस्थितियाँ इसे आत्मदाह की और धकेलती चली जाएँ, ये कार्यवाही इसके द्वारा किया गया आख़िरी प्रयत्न है. उन अंधी और बहरी शक्तियों के गलियारों तक पहुँचने का आख़िरी प्रयास। 
 
ये अचेत, लापरवाह, इत्तेफ़ाक़न या कोई खुदगर्ज़ कार्य कदापि नहीं है।
 
अपनी जीविका, कुटुंब और भविष्य के लिए लड़ना आत्म-संरक्षण कहलाता है।
 
और आत्म-संरक्षण को भला राजनीतिज्ञ से बेहतर कौन समझ सकता है। फिर चाहे वो देश के प्रधान सेवक हो या कोई आम नगर सेवक।
 
Translated By: Jeet Singh


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